नवसृजित महावीर प्राथमिक विद्यालय हरिजन टोला पिपराही में 115 बच्चों के लिए नहीं है समुचित रास्ता, जर्जर कमरों में चल रही पढ़ाई
मधेपुरा। शिक्षा के अधिकार और सरकारी स्कूलों में बेहतर सुविधाओं के दावों के बीच घैलाढ़ प्रखंड के पिपराही स्थित नवसृजित महावीर प्राथमिक विद्यालय हरिजन टोला की तस्वीर 20 सालों के बाद भी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। वर्ष 2006 में स्थापित इस विद्यालय में कक्षा एक से पांच तक 115 बच्चे नामांकित हैं और पढ़ाने के लिए पांच शिक्षक पदस्थापित हैं, लेकिन विद्यालय तक पहुंचने के लिए आज तक समुचित सड़क की व्यवस्था नहीं हो सकी है।
विद्यालय खेत के बीच स्थित है। यहां पहुंचने के लिए शिक्षक और बच्चों को खेत की आड़ से होकर गुजरना पड़ता है। बरसात शुरू होते ही रास्ते की मुश्किल और बढ़ जाती है। खेतों में पानी जमा होने के बाद छोटे-छोटे बच्चों को पानी से होकर स्कूल पहुंचना पड़ता है। कई बार ग्रामीणों और विद्यालय स्तर से समस्या की शिकायत की गई, लेकिन अब तक स्थायी समाधान नहीं हो सका है।
सड़क नहीं, सुविधाएं भी अधूरी
विद्यालय के प्रधानाध्यापक कर्मवीर कुमार के नेतृत्व में विद्यालय का संचालन किया जा रहा है, लेकिन मूलभूत सुविधाओं की कमी के कारण बच्चों और शिक्षकों को परेशानी उठानी पड़ रही है। सवाल यह है कि जब सरकार सरकारी विद्यालयों में बच्चों को बेहतर शिक्षा देने और स्कूल तक सुगम पहुंच की बात करती है, तो पिपराही के इस विद्यालय तक पहुंचने के लिए आज तक रास्ता क्यों नहीं बनाया गया? विद्यालय के शिक्षक मुनेश्वर राम का कहना है खेत में पानी लग जाने के बाद कपड़े को समेट कर हाथ में चप्पल लेकर विद्यालय तक आना पड़ता है जो की बहुत ही परेशानी होती है। बारिश के दिनों में खेत में पानी भरने से बच्चों के कपड़े गंदे होने, फिसलने और दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। बारिश के समय खेत में पानी लगने के बाद शिक्षक हाथ में चप्पल लेकर और छात्र खाली पैर किताब लेकर किसी तरह विद्यालय तक पहुंचते हैं। ऐसे में अभिभावकों के लिए भी बच्चों को स्कूल भेजना चिंता का कारण बन जाता है। छात्र बादल कुमार, सुशील कुमार, अंजली कुमारी का भी कहना है कि स्कूल जाने के लिए रास्ता नहीं है, खेत में कीचड़ हो जाता है जिसके कारण चप्पल घर पर ही छोड़ कर खाली पैर स्कूल आते है।
एक तरफ स्कूलों में नामांकन बढ़ाने और बच्चों को शिक्षा से जोड़ने की मुहिम चल रही है, वहीं दूसरी ओर 115 बच्चों वाला विद्यालय रास्ते और सुरक्षित भवन जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहा है। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था के दावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है। अब जरूरत है कि शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन विद्यालय तक स्थायी पहुंच मार्ग उपलब्ध कराने के साथ जर्जर कमरों की मरम्मत और अतिरिक्त कक्षों की व्यवस्था करे, ताकि बच्चों को बारिश में पानी से होकर स्कूल पहुंचने और जर्जर कमरों में पढ़ने की मजबूरी से निजात मिल सके।
तीन कमरे, 115 बच्चों की पढ़ाई
विद्यालय में कुल चार कमरे हैं। इनमें एक छोटे कमरे में कार्यालय का संचालन होता है, जबकि केवल तीन कमरों में बच्चों की पढ़ाई कराई जाती है। उपलब्ध कमरों में ही अलग-अलग कक्षाओं को समायोजित कर पढ़ाने की व्यवस्था की गई है। इससे बच्चों के लिए पर्याप्त और अनुकूल शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।
विडंबना यह है कि जो कमरे उपलब्ध हैं, उनकी स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। बारिश के दौरान छत से पानी टपकने लगता है। ऐसे में बच्चों को बैठाकर पढ़ाना शिक्षकों के लिए भी चुनौती बन जाता है। जर्जर भवन और सीमित कमरों के बीच विद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था किसी तरह संचालित हो रही है।
निरीक्षण पर निरीक्षण, फिर भी 20 साल से सड़क गायब! कौन है जिम्मेदार?
मधेपुरा सदर के विधायक पूर्व में शिक्षा मंत्री रह चुके हैं। इसके बावजूद जिले के सरकारी विद्यालयों की जमीनी तस्वीर शिक्षा व्यवस्था के दावों पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। महावीर प्राथमिक विद्यालय हरिजन टोला पिपराही की बदहाली तो महज एक उदाहरण है। जिले में ऐसे दो सौ से अधिक विद्यालय बताए जाते हैं, जहां कहीं जमीन का अभाव है, कहीं जमीन उपलब्ध होने के बावजूद भवन नहीं है और कहीं भवन है तो पर्याप्त कमरे व मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं। सवाल सीधा है—जब स्कूल की बुनियादी जरूरतें ही पूरी नहीं होंगी तो शिक्षा की नींव मजबूत कैसे होगी?
सरकारें आती हैं, घोषणाएं होती हैं, योजनाएं बनती हैं, अधिकारी निरीक्षण करते हैं और आश्वासन भी मिलते हैं, लेकिन सवाल यह है कि जमीन पर काम कब दिखाई देगा? आखिर जिम्मेदार कौन है?
पिपराही का यह विद्यालय वर्ष 2006 से संचालित है। करीब 20 वर्षों से विद्यालय तक पहुंचने के लिए समुचित सड़क नहीं है। 115 बच्चे खेत की आड़ से होकर स्कूल पहुंचते हैं और बारिश के दिनों में पानी से होकर गुजरना उनकी मजबूरी बन जाती है। विद्यालय में चार कमरे हैं, जिनमें एक कार्यालय के लिए है और बाकी तीन कमरों में पांच कक्षाओं के बच्चों को पढ़ाया जाता है। ऊपर से जर्जर कमरों में बारिश के दौरान पानी टपकता है।
सबसे बड़ा सवाल उन निरीक्षणों पर है, जो समय-समय पर विभागीय अधिकारियों द्वारा किए जाते होंगे। क्या अधिकारी खेत की आड़ से होकर विद्यालय पहुंचते हैं? अगर पहुंचते हैं तो क्या उनकी निरीक्षण रिपोर्ट में रास्ता नहीं होने की बात दर्ज होती है? यदि दर्ज होती है तो अब तक समाधान क्यों नहीं हुआ? और यदि दर्ज नहीं होती तो फिर निरीक्षण किस बात का?
विडंबना देखिए कि इसी विद्यालय में चुनाव के दौरान मतदान केंद्र बनाया जाता है। जिस जगह से लोकतंत्र की सरकार चुनी जाती है, वहां पहुंचने के लिए बच्चों और शिक्षकों के पास आज भी पक्का रास्ता नहीं है। वोट लेने और बूथ बनाने के लिए व्यवस्था पहुंच जाती है, लेकिन बच्चों की शिक्षा तक व्यवस्था का रास्ता क्यों नहीं पहुंच पाता?
यह सिर्फ एक विद्यालय की समस्या नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जो शिक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन स्कूल की चौखट तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने में वर्षों लगा देती है।


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